Moha Moha Ke Dhage Stories Book

9789355719744 Hindi Namaskar Books 1 2026 144 Paperback 9789355719744

कहते हैं, कलयुग में धर्म एक पाँव पर लड़खड़ाता चल रहा है। इस पाँव की बैसाखी बनती हैं कभी हर्षिता की रक्षक मृदुला दी तो कभी रोशनी की लकीर बिखेरती कनुप्रिया। सच है, बदलते मूल्यों ने स्वार्थ को खाद-पानी दिया है, जिसकी उपज हैं ओल्ड एज होम और अनाथालय किंतु इसी माहौल ने सोच के पैरों में पड़ी बेड़ियों को भी काट फेंका है। अकेलेपन से जूझते बुजुर्गों की बसंत की खुशबू को मुट्ठी में कैद करने की हालिया ख्वाहिशें बेहद सुखद हैं। सोमेश और चित्रांगदा जैसे किरदार नाउम्मीदी के पाँवों में बेताबियाँ भरते हैं पाठक की बंद सोच की खिड़कियाँ खोलते हैं। पारंपरिक वर्जनाओं की शिकार कस्तूरी को भी जीवन-संध्या में ठाँव मिल ही जाती है।

इस संग्रह की कहानियाँ परिवार और समाज के आड़े-तिरछे सवालों से टकराती हैं। बच्चे घर की दहलीज में ही रंगभेद के शिकार होते हैं, स्कूल की चारदीवारी में दागदार होते हैं। बचपन की पीठ पर चाबुक की तरह पड़े अपशब्द कुंठा का बीज बोते हैं और उम्र के साथ यह विषवृक्ष सघन होता जाता है। जबकि प्रशस्ति का एक शब्द कृतज्ञता में लिपटा ‘थैंक यू’ उम्र के आखिरी पायदान पर कमर झुकाए खड़ी उमा की माँ की रीढ़ में संगीत भर देता है। सांप्रदायिक सौहार्द की कहानी ‘फिरोजा’ एक मनिहारिन के शब्दचित्र के व्याज से एक लुप्त होती पारंपरिक जाति, उसके व्यवसाय और संस्कृति की पड़ताल करती है। विविध कोणों से समाज का विमर्श करती ‘मोह-मोह के धागे’ संग्रह की कहानियाँ कमोबेश हर पाठक की रुचियों का परिष्कार करेंगी।